Friday, May 1, 2020

Lakh Kee Chudiyan ICSE 8 Hindi by Conquer Classes

Lakh Kee Chudiyan Summary – पाठ का सार

इस पाठ के द्वारा लेखक लघु उद्योग की ओर पाठको का ध्यान करवा रहे है। वे कहते हैं कि बदलते समय का प्रभाव हर वस्तु पर पड़ता है। बदलू व्यवसाय से मनिहार है। वह अत्यंत आकर्षक चूड़ियाँ बनाता है। गाँव की स्त्रियाँ उसी की बनाई चूड़ियाँ पहनती हैं। बदलू को काँच की चूड़ियों से बहुत चिढ़ है। वह काँच की चूड़ियों की बड़ाई भी नहीं सुन सकता तथा कभी-कभी तो दो बातें सुनाने से भी नहीं चूकता ।
शहर और गाँव की औरतों की तुलना करते हुए वह कहता है कि शहर की औरतों की कलाई बहुत नाजुक होती है। इसलिए वह लाख की चूड़ियाँ नहीं पहनती है। लेखक अकसर गाँव जाता है तो बदलू काका से जरूर मिलता है क्योकि वह उसे लाख की गोलियां बनाकर देता है। परन्तु अपने पिता जी की बदली हो जाने की वजह से इस बार वह काफी दिनों बाद गाँव आता है।
वह वहां औरतों को काँच की चूड़ियाँ पहने देखता है तो उसे लाख की चूड़ियों की याद हो आती है वह बदलू से मिलने उसके घर जाता है।बातचीत के दौरान बदलू उसे बताता है कि लाख की चूड़ियों का व्यवसाय मशीनी युग आने के कारण बंद हो गया है और काँच की चूड़ियों का प्रचलन बढ़ गया है।
इस पाठ के द्वारा लेखक ने बदलू के स्वभाव, उसके सीधेपन और विनम्रता को दर्शाया है। मशीनी युग से आये परिवर्तन से लघु उद्योग की हानि परप्रकाश डाला है। अंत में लेखक यह भी मानता है कि काँच की चूड़ियों के आने से व्यवसाय में बहुत हानि हुई हो किन्तु बदलू का व्यक्तित्व काँच की चूड़ियों की तरह नाजुक नहीं था जो सरलता से टूट जाए।

लाख की चूड़ियाँ पाठ  व्याख्या और शब्द अर्थ – Explanation and Meaning of Difficult Words

सारे गाँव में बदलू मुझे सबसे अच्छा आदमी लगता था क्योंकि वह मुझे सुंदर-सुंदर लाख की गोलियाँ बनाकर देता था। मुझे अपने मामा के गाँव जाने का सबसे बड़ा चाव  यही था कि जब मैं वहाँ से लौटता था तो मेरे पास ढेर सारी गोलियाँ होतीं, रंग-बिरंगी गोलियाँ जो किसी भी बच्चे का मन मोह लें।
लाख  लाह
चाव  ख़ुशी
गोलियाँ – कंचे
मोह  आकर्षित
लेखक आपने बारे में बताता है कि जब लेखक छोटे थे बदलू यानी उनके मामा जो उन्हें सबसे अच्छे लगते थे।  वे उन्हें वह सुंदर-सुंदर लाख की गोलियाँ बनाकर खेलने के लिए देता था।
लेखक को अपने मामा के गाँव जाने की सबसे ज़्यादा  ख़ुशी यही थी कि जब लेखक की छुट्टयाँ खत्म हो जाने के बाद वह अपने घर लौटते थे तो उनके  पास बहुत सारी लाख की रंग बिरंगी गोलियाँ हुआ करती थीं। जो रंग-बिरंगी गोलियाँ जिन्हें देखकर बच्चों का मन उनकी तरफ आकर्षित हो जाए। इतनी सुंदर गोलियाँ उनके मामा बदलू बनाकर देते थे। ऐसी गोलियाँ दूसरों बच्चों के पास शायद नहीं हुआ करती थीं। उन काँचों के साथ खेलना लेखक को बहुत अच्छा लगता था। वो देखने में ही इतनी रंग-बिरंगी थी कि मन मोहित हो जाता था।
यह कहानी लेखक के बचपन की है।  वह अपने मामा के घर जाता है और वहाँ पर जो बदलू मामा के द्वारा बनाई गई सुन्दर-सुन्दर लाख की गोलियाँ के साथ खेलता है, प्रसन्न होता है और उसे गाँव जाना तथा अपने मामा के गाँव जाना बहुत अच्छा लगता है क्योंकि जब वह वापस आता है तो उसके पास बहुत सारी ढे़र सारी काँच की गोलियाँ होती हैं जिसे वह अन्य बच्चों को दिखकर प्रसन्नता महसूस करता है।
वैसे तो मेरे मामा के गाँव का होने के कारण मुझे बदलू को ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था परंतु मैं उसे ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ कहा करता था जैसा कि गाँव के सभी बच्चे उसे कहा करते थे। बदलू का मकान कुछ ऊँचे पर बना था।
जैसा कि रिश्ते  में होता है कि माँ के गाँव में रहने वाले जो व्यक्ति हैं या तो वह नाना हैं या मामा हैं, परन्तु लेखक बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ कहा करता था क्योंकि गाँव के अन्य बच्चे भी  मामा को काका कहते थे । तो लेखक मामा न कहकर काका बुलाने लगे।
बदलू का मकान कुछ ऊँचे पर बना था। थोड़ी ऊंचाई पर बना था जहां पर वह जाते थे और उनके कार्य को देखते थे की वह किस तरह लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं गोलियाँ बनाते हैं उनको काम करते हुए देखना लेखक को बहुत अच्छा लगता था
चूड़ियाँ
मकान के सामने बडा़-सा सहन था जिसमें एक पुराना नीम का वृक्ष लगा था। उसी के नीचे बैठकर बदलू अपना काम किया करता था। बगल में भट्टी दहकती रहती जिसमें वह लाख पिघलाया करता।
सहन  आँगन
वृक्ष  पेड़
भट्टी  अँगीठी
दहकती जलती
जो बदलू मामा का मकान था वह थोड़ा ऊँचे पर था और मकान के सामने बड़ा-सा आँगन था जिसमें एक पुराना नीम का पेड़ था उसी के नीचे  बैठकर बदलू अपना काम करते थे। उनके पास ही भट्ठी जलती रहती थी क्योंकि लाख को पिघलाकर उसे आकार दिया जाता था ।
जैसा कि तस्वीर में दर्शाया गया है कि एक तरफ भट्ठी है जहाँ पर लाख को पिघलाया जाता है और यहाँ पर एक औज़र है जिसके द्वारा वो लाख को आकार  दे कर चूड़ियाँ बना रहें हैं। और साथ में उन्हें हुक्का पीने का भी बहुत शौक हुआ करता था। काम के साथ-साथ वह हुक्का भी पी लेते थे।
सामने एक लकड़ी की चौखट पड़ी रहती जिस पर लाख के मुलायम होने पर वह उसे सलाख के समान पतला करके चूड़ी का आकार देता। पास में चार-छह विभिन्न आकार की बेलननुमा मुँगेरियाँ रखी रहतीं जो आगे से कुछ पतली और पीछे से मोटी होतीं।
चौखट – लकड़ी का चौकोर टुकड़ा
सलाख – धातु की छड़
बेलननुमा मुँगेरियाँ – गोल लकड़ी
यहाँ पर यह बताया गया है कि बदूल मामा लाख की चूड़ियाँ किस तरह से बनाते थे । एक चौखट होती थी, लकड़ी का चौकोर टुकड़ा होता था जिसपर वह लाख को आग में सुलगा कर मुलायम कर देते थे और एक धातु की छड़ के समान पतला करके उसे चूड़ी का आकर दे देते थे।
पास में चार-छ अलग-अलग तरह की गोल-लकड़ी होती थी जिसकी सहायता से वह मोटी और पतली तरह की चूड़ियाँ बनाई जा सकती थी। उस समय में औरतें इसी प्रकार की चूड़ियाँ पहनना पंसद करती थी। इसी कारण से बदलू मामा चूड़ियाँ बनाया करते थे।
चूड़ियाँ
लाख की चूड़ी का आकार देकर वह उन्हें मुँगेरियों पर चढ़ाकर गोल अैर चिकना बनाता अैर तब एक-एक कर पूरे हाथ की चूड़ियाँ बना चुकने के पश्चात् वह उन पर रंग करता।
पश्चात्  बाद में
लाख की चूड़ी का आकार देने के बाद उन्हें रंग-बिरंगे रंग दे देता था। जिससे चूड़ियाँ दिखने में और सुंदर लगती थी।
सीधे शब्दों में कहा जाए तो जब चूड़ियाँ बनकर तैयार हो जाती थीं मुँगेरियों पर चढ़ाकर उन्हें गोल सुन्दर आकर दे दिया जाता था उसके बाद उन पर अलग-अलग तरह के रंग कर दिया जाता था जैसा कि औरतें रंग-बिरंगी चूड़ियाँ पहनना पसंद करती हैं।
यहाँ तस्वीर  में आप देख रहें हैं गोल मुँगेरि है जिस पर एक लाल रंग की चूड़ी बनाई गयी है लाख के द्वारा।
बदलू यह कार्य सदा ही एक मचिये पर बैठकर किया करता था जो बहुत ही पुरानी थी। बगल में ही उसका हुक्का रखा रहता जिसे वह बीच-बीच में पीता रहता। गाँव में मेरा दोपहर का समय अधिकतर बदलू के पास बीतता। वह मुझे ‘लला’ कहा करता और मेरे पहुँचते ही मेरे लिए तुरंत एक मचिया मँगा देता।
मचिये  चौकोर खाट
बदलू हमेशा एक चारपाई पे काम किया करता था । उसकी चारपाई थी वह बहुत पुरानी थी; पुराने ज़माने में लोग इस तरह की चारपाई पर बैठा करते थे और अपने काम भी किया करते थे। जब वह काम से थोड़ी फुर्सत पाता, बीच-बीच में अपना हुक्का पी लिया करता था।
जब लेखक गाँव में मामा के घर जाते, तो उनका अधिकतर समय बदलू मामा के साथ बीतता। क्योंकि उनके पास बैठना, उन्हें काम करते देखना उन्हें अच्छा लगता था। वह उन्हें प्यार से लला कह कर पुकारते थे। और उनके  पहुँचने पर चारपाई माँगवा देते थे। और कहा करते थे कि तुम यहाँ पर बैठो और देखो कि में किस तरह से काम करता हूँ।
मैं घंटों बैठे-बैठे उसे इस प्रकार चूड़ियाँ बनाते देखता रहता। लगभग रोज ही वह चार-छह जोड़े चूड़ियाँ बनाता। पूरा जोड़ा बना लेने पर वह उसे बेलन पर चढ़ाकर कुछ क्षण चुपचाप देखता रहता मानो वह बेलन न होकर किसी नव-वधू की कलाई हो।
नव-वधू – नई बहू
घंटों बीत जाते, समय ज्यादा हो जाता लेकिन लेखक ऐसे ही बैठा रहता क्योंकि उनके काम करने का तरीका ही रोचक था । कभी वह लाख पिघलाते थे फिर मुँगेरि पर उस लाख को चढ़ाकर एक नया आकर दे देते थे। और रंग-बिरंगी  चूड़ियाँ बनाते थे। इस तरह वह लगभग दिन में 4-6 जोडे़ चूड़ी बनाते थे। देखा जाए तो यह बहुत मेहनत भरा काम था।

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पूरा जोड़ा तैयार हो जाने पर वह बेलन पर चढ़ा कर कुछ पल के लिए चुपचाप उसे देखते रहते थे । जब बदलू मामा अपने काम को देखते कि चूड़ी का सही आकर बना है या नहीं, तो प्रसन्न होते । मानो वह बेलन न होकर किसी नई दुल्हन की कलाई हो। अर्थात् छड पर चढ़ी चूड़ियों को इस तरह से निहारते थे जैसे कि किसी नई दुल्हन की कलाई हो।
बदलू मनिहार था। चूड़ियाँ बनाना उसका पैतृक पेशा था और वास्तव में वह बहुत ही सुंदर चूड़ियाँ बनाता था। उसकी बनाई हुई चूड़ियों की खपत भी बहुत थी।
मनिहार चूड़ी बनाने वाला
पैतृक  पिता सम्बन्धी
वास्तव  हकीकत
खपत  बिक्री
जो चूड़ियाँ बनाता है उसे मनिहार कहा जाता है, जैसे बदलू मामा का काम था – चूड़ी बनाना। पैतृक यानि पिता सम्बन्धी अर्थात् जो बदलू मामा के पिता थे या दादा थे वह भी चूड़ियाँ ही बनाने का काम करते थे; यह उनका रोजी-रोटी कमाने का तरीका था। वह बहुत ही सुंदर-सुंदर चूड़ियाँ बनाता था। बदलू अपने काम में बहुत ही निपूंण था। उसके द्वारा बनाई गई चूड़ियों की बिक्री भी बहुत होती थी। लोग उससे बहुत सारी चूड़ियाँ खरीदते थे क्योंकि वह चूड़ियाँ बहुत ही मजबूत और सुंदर बनाता था।
उस गाँव में तो सभी स्त्रियाँ उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ पहनती ही थी आस-पास के गाँवों के लोग भी उससे चूड़ियाँ ले जाते थे। परंतु वह कभी भी चूड़ियों को पैसों से बेचता न था। उसका अभी तक वस्तु-विनिमय का तरीका था और लोग अनाज के बदले उससे चूड़ियाँ ले जाते थे।
वस्तु-विनिमय  वस्तु के बदले वस्तु
सभी स्त्रियाँ उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ पहनती थी और आस-पास के गाँव के लोग भी उससे चूड़ियाँ ले जाते थे । उसका काम ही इतना अच्छा था कि उसके गाँव के अलावा दूसरे गाँव के लोग भी चूड़ियाँ खरीद कर ले जाते थे। परन्तु वह कभी भी चूड़ियाँ पैसों  से नहीं बेचता था । उसका तो सीधा हिसाब था कि वस्तु के बदले वस्तु लेना अर्थात् जैसा कि पुराने समय में हुआ करता था कि अगर हमें अनाज लेना है तो उसके बदले हमारे पास जो भी चीज़ उपलब्ध है वो देकर हम अपनी मन पसंद चीज़ खरीद सकते थे। और लोग अनाज के बदले उससे चूड़ियाँ ले जाते थे। कहने का अर्थ यह है कि पैसों के बदले अनाज ले लिया जाता था।
बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। मैंने कभी भी उसे किसी से झगड़ते नहीं देखा। हाँ, शादी-विवाह के अवसरों पर वह अवश्य जिद़ पकड़ जाता था। जीवन भर चाहे कोई उससे मुफ्त चूड़ियाँ ले जाए परंतु विवाह के अवसर पर वह सारी कसर निकाल लेता था। आखिर सुहाग के जोड़े का महत्त्व ही और होता है।
विवाह  शादी
कसर  कमी
बदलू का स्वभाव नम और भोला भाला था। न वह किसी से ज्यादा बात करता और न ही कभी किसी से लड़ता-झड़ता था। उसे ज़रा सा भी गुस्सा नहीं आता था सारा दिन अपने काम में जो लगा रहता था। हाँ शादी-विवाह के समय में अवश्य जिद् किया करता था। क्योंकि यही एक अवसर हुआ करता था जो कि वः अपनी चूड़ियाँ बेच कर अच्छा कमा सकता था। अर्थात् मनचाहा  वेतन ले सकता था।
किसी भी विवाह के अवसर पर  वह अपनी चूड़ियों की एक अच्छी खासी कीमत ले लेता था। जिससे उसका गुज़ारा ठीक से चल जाता था । आखिर सुहाग के जोड़े का महत्व ही कुछ खास होता है। यह एक महत्वपूर्ण चीज है कि सुहाग के जोड़े को बहुत ही पवित्र माना जाता है। इसीलिए उसको मुँह माँगे दाम मिल जाते थे।
मुझे याद है, मेरे मामा के यहाँ किसी लड़की के विवाह पर जरा-सी किसी बात पर बिगड़ गया था और फिर उसको मनाने में लोहे लग गए थे।
लोहे लगना  – मुश्किल होना
एक बार की बात है लेखक को याद आया कि बदलू मामा किसी लड़की के विवाह पर छोटी सी बात पर नाराज़ हो गया, बिगड़ गया। और उसे मनाना बहुत मुश्किल हो  गया था।
विवाह में इसी जोड़े का मूल्य इतना बढ़ जाता था कि उसके लिए उसकी घरवाली को सारे वस्त्र मिलते, ढेरों अनाज मिलता, उसको अपने लिए पगड़ी मिलती और रुपये जो मिलते सो अलग।
घरवाली – पत्नि
ढेरों – बहुत सारा
पगड़ी – पग
विवाह में इसी जोड़े का मूल्य इतना बढ़ जाता था कि उसके लिए उसकी पत्नि को सारे वस्त्र मिलते, अर्थात् बदलू मामा की पत्नि को भी वस्त्र मिल जाते थे जब किसी का विवाह होता था । उस विवाह पर बदलू के द्वारा बनाई गई चूड़ियाँ इस्तेमाल कि जाती थी तो घर के सभी सदस्यों के लिए कुछ न कुछ भेंट स्वरूप मिल जाता था। बहुत सारा अनाज मिल जाता था जिससे घर का गुज़ारा अच्छे से हो जाता था  । उसको अपने लिए पगड़ी मिल जाती थी, (पगड़ी का अर्थ है पग जो सिर पर बँधाते है ) और जो रूपये मिलते वो अलग से। कुछ लोग भेंट स्वरूप उसे रूपये दे देते थे जोकि एक अच्छा मौका था अच्छी खासी आमदनी कमाने का । उससे उसका पूरे साल का खर्चा चल जाता था।
यदि संसार में बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो वह थी काँच की चूड़ियाँ से। यदि किसी भी स्त्री के हाथों में उसे काँच की चूड़ियाँ दिख जातीं तो वह अंदर-ही-अंदर कुढ़ उठता और कभी-कभी तो दो-चार बातें भी सुना देता।
अंदर-ही-अंदर कुढ़ – मन ही मन दुखी होना
उसे काँच की चूड़ियाँ जरा सी भी पसन्द नहीं थी क्योंकि वह लाख की चूड़ियाँ बनाता था। काँच की चूड़ियाँ लोगों को पसंद आने लगी थी क्योंकि गाँव में भी शहरीकरण हो गया था। नए नए उद्योग शुरू हो गए थे मशीनों से चीज़ें बनाई जाने लगी थी। जोकि लोगों को पसंद आती थी। इस कारण उसका काम धंधा थोड़ा धीमा पड़ गया था और उसे काँच की चूड़ियाँ पसंद नहीं थी।
अगर वह किसी भी स्त्री के हाथों में काँच की चूड़ियाँ देख लेता तो मन ही मन दुखी हो जाता था। और कभी कभी तो दो चार बातें भी सुना देता।
मुझसे तो वह घंटों बातें किया करता। कभी मेरी पढा़ई के बारे में पूछता, कभी मेरे घर के बारे में और कभी यों ही शहर के जीवन के बारे में। मैं उससे कहता कि शहर में सब काँच की चूड़ियाँ पहनते हैं तो वह उत्तर देता, शहर की बात और है, लला! वहाँ तो सभी कुछ होता है।
बदलू मामा लेखक से घंटों बातें किया करते थे – अपना सुख-दुख बाँटते थे । कभी उनकी  पढ़ाई और घर के बारे में पूछते थे, कभी यूँ ही शहरी जीवन के बारे में जानना चाहते थे। लेखक उससे कहता कि शहर में सब काँच की चूड़ियाँ पहनते हैं। जब भी वे पूछते कि शहर में कैसे कैसे लोग हैं और क्या चीज़े पसंद करते हैं, उनका रहन-सहन क्या है तो वे  उन्हें बताते कि शहर में भी लोग काँच की चूड़ियाँ पहनना पसंद करते है। तो वह उत्तर देता कि शहर की बात और है। ये तो गाँव है। गाँव की चीज़ों में कुछ खसियत होती है और जो हाथ के द्वारा बनाई गई चीज़े हैं उनका महत्व तो ज़्यादा है। मशीनें उसका मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसा बदलू मामा का मानना था।
वहाँ तो औरतें अपने मरद का हाथ पकड़कर सड़कों पर घूमती भी हैं और फिर उनकी कलाइयाँ नाजुक होती हैं न! लाख की चूड़ियाँ पहनें तो मोच न आ जाए।’’
मरद – पति
नाजुक – कोमल
जब लेखक बदलू मामा को बताते हैं कि शहर में किस तरह का रहन-सहन है तो वह यह भी बात कहते हैं कि शहरी औरतें अपने पतियों का हाथ पकड़कर खुलम-खुला सड़कों पर घूमती हैं क्योंकि वे आज़ाद हैं और उनके रहने का अंदाज अलग है। गाँव की औरतें ऐसा नहीं करती। उनकी कलाईयाँ नाजुक नहीं होती है। लेखक का मानना है कि शहरी स्त्रियां नाजुक हैं क्योंकि जरा सा भी बोझ नहीं उठाती  हैं । वे काम-काज नहीं करती हैं इसलिए उनकी कलाईयाँ बहुत ही नाजुक हैं । लेखक के मामा का मानना था कि अगर वह लाख की चूड़ियाँ पहनती हैं तो कहीं उनके हाथों में मोच न आ जाए क्योंकि लाख की चूड़ियाँ काँच की चूड़ियाँ से थोड़ी भारी होती हैं ।
कभी-कभी बदलू मेरी अच्छी खासी खातिर भी करता। जिन दिनों उसकी गाय के दूध होता वह सदा मेरे लिए मलाई बचाकर रखता और आम की फसल में तो मैं रोज ही उसके यहाँ से दो-चार आम खा आता।
खातिर – मेहमान नवाजी
कभी-कभी बदलू लेखक की अच्छी खासी खातिर करता। जब लेखक बदलू मामा के यहाँ पहुचते, तो बदलू मामा उनकी मेहमान नवाजी भी करते । उनका हाल चाल पूछते, उनकी अच्छी सेवा करते। जब बदलू मामा की गाय दूध देती तो वह उनके लिए मलाई बचाकर रखते थे क्योंकि लेखक को मलाई खाना बहुत अच्छा लगता था। और जब आम की फसल होती तो लेखक रोज ही उसके यहाँ से दो-चार आम खा आता था।
परंतु इन सब बातों के अतिरिक्त जिस कारण वह मुझे अच्छा लगता वह यह था कि लगभग रोज ही वह मेरे लिए एक-दो गोलियाँ बना देता।
अतिरिक्त – अलावा
रोज – प्रतिदिन
परंतु इन सब बातों के अलावा कुछ कारण थे जिस कारण से वह लेखक को अच्छा लगता था। बदलू मामा उसे किन कारणों से पसंद था यह लेखक बता रहे हैं।लगभग रोज लेखक के लिए एक-दो गोलियाँ बना देता और वह खेलने के लिए लेखक को दे देता  थे। यह एक मुख्य कारण था कि उन्हें बदलू मामा अच्छे लगते थे।
मैं बहुधा हर गर्मी की छुट्टी में अपने मामा के यहाँ चला जाता और एक-आध महीने वहाँ रहकर स्कूल खुलने के समय तक वापस आ जाता।
बहुधा – हमेशा
जैसा कि हर स्कूल में गर्मीयों की छूट्टीयाँ होती हैं, सभी बच्चे अपने मामा के घर जाते हैं तो लेखक भी अपने मामा के यहाँ चला जाता था। पूरा ढ़ेड महीना अपने मामा के घर में बिताता था और वहाँ पर ज्यादातर समय बदलू मामा के साथ बिताता क्योंकि वह उसे खेलने के लिए लाख की गोलियाँ देते थे।
परंतु दो-तीन बार ही मैं अपने मामा के यहाँ गया होऊँगा तभी मेरे पिता की एक दूर के शहर में बदली हो गई और एक लंबी अवधि तक मैं अपने मामा के गाँव न जा सका। तब लगभग आठ-दस वर्षों के बाद जब मैं वहाँ गया तो इतना बड़ा हो चुका था कि लाख की गोलियों में मेरी रुचि नहीं रह गई थी।
अवधि – समय
रुचि – लगाव
ऐसा दो-तीन बार ही हुआ  की गर्मियों की छूट्टीयों में जब लेखक अपने मामा के घर गए होते, तभी उनके पिता की बदली हो जाती अर्थात् उन्हें दूसरी जगह जाना पड़ता जिस कारण पूरा परिवार भी वहाँ चला जाता ।  फिर एक लंबे समय तक वे अपने मामा के गाँव न जा सके। यह उनकी मजबुरी थी क्यूँकि वे गाँव से दूर जा चुके थे । लगभग आठ-दस वर्षों के बाद, जब लेखक वहाँ गए तो वे इतने बड़े हो चुके थे कि लाख की गोलियों में उनकी रूचि नहीं रही गई थी।  
अतः गाँव में होते हुए भी कई दिनों तक मुझे बदलू का ध्यान न आया। इस बीच मैंने देखा कि गाँव में लगभग सभी स्त्रियाँ काँच की चूड़ियाँ पहने हैं। विरले ही हाथों में मैंने लाख की चूड़ियाँ देखीं। तब एक दिन सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया।
ध्यान  याद
स्त्रियाँ  औरतें
विरले  बहुत कम
सहसा  अचानक
जब लेखक बहुत सालों के बाद अपने मामा के गाँव लौटे, उन्हें बदलू मामा की याद नहीं आई। क्योंकि अब वह बड़े हो चुके थे उनके शौक अब बदल चुके थे। इस बीच उन्होंने देखा कि गाँव में लगभग सभी औरतें काँच की चूड़ियाँ पहने हुए हैं। अर्थात् लेखक ने जब देखा कि पहले जो स्त्रियाँ लाख की चूड़ियाँ पहनना पंसद करती थी अब उनके शौक बदल चुके हैं। वे भी अब काँच की चूड़ियाँ पहनने लगी हैं। बहुत ही कम हाथों में उसने लाख की चूड़ियाँ देखीं जोकि एक परिर्वतन का ऐहसास था। तब एक दिन अचानक  उन्हें बदलू का ध्यान हो आया, जब उन्होंने औरतों को रंग-बिरंगी काँच की चूड़ियाँ पहने देखा और कोई-कोई स्त्री लाख की चूड़ियाँ पहने थी । उनसे उनका मिलने का दिल चाहा।
बात यह हुई कि बरसात में मेरे मामा की छोटी लड़की आँगन में फिसलकर गिर पड़ी और उसके हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाई में घुस गई और उससे खून बहने लगा। मेरे मामा उस समय घर पर न थे। मुझे ही उसकी मरहम-पट्टी करनी पड़ी।
आँगन  बेड़ा
मरहम-पट्टी  घाव पर दवा लगाकर पट्टी बाँधना
एक दिन बरसात का मौसम था और लेखक के मामा की जो छोटी लड़की थी, वो आँगन में फिसलकर गिर गई थी और उसकी हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसके हाथ में घुस गई । लेखक को लगा कि काँच की चूड़ियाँ कितनी हानिकारक हो सकती हैं ।लोगों को चोट पहुंचा सकती है । जैसा कि उनके मामा की छोटी लड़की के साथ हुआ। गिरने के वजह से काँच की चूड़ियाँ कलाई में घुस गई और मामा की लड़की घायल हो गई ।
लेखक जैसा कि घर पर ही थे, और उनके मामा वहाँ पर मौजूद नहीं थे, उन्हें अपनी छोटी बहन की मरहम-पट्टी, दवा वगैरा करवानी पड़ी।
तभी सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया और मैंने सोचा कि उससे मिल आऊँ। अतः शाम को मैं घूमते-घूमते उसके घर चला गया। बदलू वहीं चबूतरे पर नीम के नीचे एक खाट पर लेटा था।
सहसा  एकाएक
ध्यान  ख्याल
चबूतरे  ऊँचा और चौरस स्थान
खाट  चारपाई
तभी अचानक लेखक को बदलू का ध्यान हो आया । लेखक ने सोचा कि उससे मिल आऊँ । उसे बदलू मामा की याद हो आई जैसा कि वे लाख की चूड़ियाँ बनाते थे और चूड़ियों का ही किस्सा वहाँ पर हो रहा था कि किस तरह काँच की चूडी़ छोटी बहन के हाथ में चुब गई है इस कारण उन्हें बदलू मामा का ख्याल हो आया और वह उनसे मिलने चले। शाम होते ही  लेखक टहलते हुए बदलू के घर पहुँचे। बदलू वहीं चबूतरे अर्थात् थोड़ी ऊँची सतह पर नीम के नीचे एक खाट यानी चारपाई पर लेटा था।
अब बदलू के पास कोई काम नहीं था इसलिए वह आराम फरमा रहा था और चबूतरे पर नीम के पेड़ के नीच एक चारपाई पर लेटा हुआ था और वह अपने ख्यालों में खोया हुआ था।
नमस्ते बदलू काका! मैंने कहा।
नमस्ते भइया! उसने मेरी नमस्ते का उत्तर दिया अैर उठकर खाट पर बैठ गया। परंतु उसने मुझे पहचाना नहीं और देर तक मेरी ओर निहारता रहा।
मैं हूँ जनार्दन, काका! आपके पास से गोलियाँ बनवाकर ले जाता था। मैंने अपना परिचय दिया।
निहारता  एकटक देखना
जैसे ही लेखक वहाँ पहुँचे तो उन्होंने नमस्ते बदलू काका बोला! उसने लेखक की नमस्ते का उत्तर दिया और उठकर खाट पर बैठ गया। बदलू मामा लेखक को पहचान नहीं पाये क्यूंकि अब वे बुजुर्ग हो चुके थे, उनके काम-काज़ भी बंद हो चुके थे कुछ परेशनी में भी थे। जैसा कि लेखक अब बड़े हो गये हैं बहुत सालों के बाद लौटे हैं तो वह पहचान नहीं पाऐ।बदलू मामा उन्हें पहचानने का प्रयास करते रहे । मैं हूँ जनार्दन, काका! जैसा कि बदलू मामा को काका ही कहते थे फिर उन्होंने अपना परिचय दिया और कहाकि उनका नाम जनार्दन था और वे उनसे लाख की गोलियां बनवाकर ले जाय करते थे।  
बदलू फिर भी चुप रहा। मानो वह अपने स्मृति पटल पर अतीत के चित्र उतार रहा हो और तब वह एकदम बोल पड़ा, आओ-आओ, लला बैठो! बहुत दिन बाद गाँव आए।
अतीत के चित्र पुरानी यादें
बदलू फिर भी चुप रहा मानो वह अपने अतीत को याद कर रहा हो । पुरानी यादों में ढूँढ रहे थे कि ये कौन हो सकता है? अचानक उन्हें लेखक की याद हो आई- ये तो लला है – तो उसे बैठने के लिए कहा। बदलू मामा ने लेखक को बोला कि आज वे बहुत दिनों के बाद गाँव आए थे। फिर पूछा कि इतने दिन कहाँ थे ।
हाँ, इधर आना नहीं हो सका, काका! मैंने चारपाई पर बैठते हुए उत्तर दिया। कुछ देर फिर शांति रही। मैंने इधर-इधर दृष्टि दौड़ाई। न तो मुझे उसकी मचिया ही नजर आई, न ही भट्टी ।
दृष्टि  नज़र
भट्टी  – चूल्हा
जैसा कि लेखक के पिता की बदली हो चुकी थी और वह दूर किसी और  शहर में रहते थे, इसलिए गाँव आना संभव नहीं था। ऐसा लेखक ने उन्हें बताया। फिर कुछ देर शांति रही।  दोनों में कुछ बातचीत नहीं हुई दोनों चुपचाप बैठे रहे। लेखक ने इधर-उधर देखा तो न ही उसकी चारपाई नजर आई और न ही उसकी भट्टी अर्थात् चूल्हा जिसमें वह लाख को पिघलाया  करते और उसकी मचिया जिस पर लेखक बैठा करते थे। उस मचिये पर बैठ कर बदलू मामा सारा दिन अपना काम करते, साथ में हुक्का पिया करते थे । यह सब सामान आस-पास कहीं नज़र नहीं आया क्योंकि अब समय में बदलाव आ चुका था और बदलू मामा का जो काम-धंधा था, हाथ से लाख की चूडियाँ बनाने का, वो अब बंद हो चुका था।
आजकल काम नहीं करते काका? मैंने पूछा।
नहीं लला, काम तो कई साल से बंद है। मेरी बनाई हुई चूड़ियाँ कोई पूछे तब तो। गाँव-गाँव में काँच का प्रचार हो गया है।
प्रचार  चलन
लेखक ने उससे पूछा कि क्या बात है आजकल आप काम नहीं करते हैं तो उन्होंने उत्तर दिया – नहीं लला, काम तो कई सालों से बंद है ।जब बदलू मामा ने बताया कि बहुत साल हो गए काम अब बंद हो गया है हाथ से चूड़ियाँ बनाना बंद हो गया है क्योंकि लोगों ने उसे पसंद करना बंद कर दिया है। अब स्त्रियाँ लाख की चूड़ियाँ पहनना पसंद नहीं करती। अब तो हर कोई काँच की ही चूड़ियाँ पहनना पसंद करता है – हर गाँव, शहर में, क्योंकि मशीनी युग की वजह से काँच की चूडियाँ बनना शुरू हो गया है । वह बहुत सुन्दर, रंग-बिरंगी, चमकीली नज़र आती हैं और औरतें उन्हें पहनना पसंद करती है।
वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, मशीन युग है न यह, लला! आजकल सब काम मशीन से होता है। खेत भी मशीन से जोते जाते हैं और फिर जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?
लेकिन काँच बड़ा खतरनाक होता है। बड़ी जल्दी टूट जाता है। मैंने कहा।
खतरनाक  नुकसान देने वाला
बदलू मामा ने कहा कि अजकल सब कुछ मशीन से ही होता है – खेत भी मशीन से जोते जाते हैं और फिर जो सुन्दरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ मुमकिन है । मशीनी युग आ गया है, सारे काम मशीनों से होते हैं, हाथ से बनाई हुई चीज़ों को लोग पसंद नहीं करते हैं।
लेखक ने कहा कि काँच बहुत नुकसान देने वाला होता है जैसा कि लेखक की मामा की छोटी बेटी की काँच की चूड़ियाँ टूट कर हाथ में चुभ गई थी, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। काँच थोड़ा सा खतरनाक पर्दाथ है जिससे चोट लग सकती है।
नाजुक तो फिर होता ही है लला! कहते-कहते उसे खाँसी आ गई और वह देर तक खाँसता रहा।
मुझे लगा उसे दमा है। अवस्था के साथ-साथ उसका शरीर ढल चुका था। उसके हाथों पर और माथे पर नसें उभर आई थीं।
नाजुक  मुलायम
दमा  लगातार खांसते रहना
ढल  कमजोर
उभर  दिखने लगी
बदलू मामा बोले कि काँच मुलायम होता है उसे कोई भी आकार दिया जा सकता है। मामा की तबीयत अब ठीक नहीं थी वह अब बुर्जुग हो चुके थे वह देर तक खाँसते रहे। लेखक को लगा की उन्हें दमा है अर्थात् लगातार खाँसते रहने की बीमारी जोकि मामा को हो गई थी । उम्र के साथ-साथ उसका शरीर कमजोर हो चुका था उसके हाथों और माथे की नसें अब दिखने लगी थी जैसा कि बुर्जुग लोग के साथ होता है ।
जाने कैसे उसने मेरी शंका भाँप ली और बोला, “दमा नहीं है मुझे। फसली खाँसी है। यही महीने-दो-महीने से आ रही है। दस-पंद्रह दिन में ठीक हो जाएगी।”
शंका  दुविधा या शक़
भाँप  जानना
फसली खाँसी  बदलते मौसम के कारण हुई ख़ासी
मामा ने जैसे लेखक के मन की बात जान लीऔर खा कि उन्हें  दमा नहीं है, फसली खाँसी अर्थात् बदलते मौसम के कारण हुई खासी है। जैसा कि सर्दी के बाद गर्मी, गरमी के बाद सर्दी मौसम आता है, तो तापमान में बदलाव के कारण, ऐसी छोटी मोटी खाँसी हो जाया करती है।
मैं चुप रहा। मुझे लगा उसके अंदर कोई बहुत बड़ी व्यथा छिपी है। मैं देर तक सोचता रहा कि इस मशीन युग ने कितने हाथ काट दिए हैं। कुछ देर फिर शांति रही जो मुझे अच्छी नहीं लगी।
व्यथा – दुख
हाथ काटना – बेरोज़गार करना
लेखक को अब महसूस होने लगा था कि मामा के ऊपर बहुत कुछ गुजरा है । वे इतने दिनों के बाद लौटे थे, कुछ न कुछ दुख था बदलू मामा के मन में जोकि वह अब छुपाए बैठे थे । वः देर तक सोचता रहा है कि वो क्या हो सकता है। इस मशीनी युग ने बहुत सारे लोगों का हाथ का काम छिन लिया है उनके रोजगार को छीन लिया है। अब वे बेरोज़गार होकर बिलकुल नकाम हो गए हैं। उनका काम धन्धा अच्छी तरह नहीं चलता और उन्हें अब रोज़ी रोटी कमाने में भी दिक्कत आने लगी है। दोनों के बीच फिर सन्नाटा सा छा गया और कोई बातचीत नहीं हुई। लेखक कुछ न कुछ सोचते रहें कि ऐसा क्या हुआ है बदलू मामा के साथ कि यह अपने मन की व्यथा उनसे नहीं कह रहे है।
आम की फसल अब कैसी है, काका? कुछ देर पश्चात मैंने बात का विषय बदलते हुए पूछा। ‘अच्छी है लला, बहतु अच्छी है, उसने लहककर उत्तर दिया और अंदर अपनी बेटी को आवाज दी, अरी रज्जो, लला के लिए आम तो ले आ।
पश्चात – बाद
लहककर – खुश हो कर
लेखक ने आगे बात बड़ाई और पूछा कि आम की फसल कैसी थी । बहुत अच्छी है – उसने खुश हो कर जवाब दिया। और अन्दर अपनी बेटी को आवाज़ दी और लेखक के लिए आम लाने के लिए कहा।
फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, माफ़ करना लला, तुम्हें आम खिलाना भूल गया था।
नहीं, नहीं काका आम तो इस साल बहुत खाए हैं।
वाह-वाह, बिना आम खिलाए कैसे जाने दूँगा तुमको?
मैं चुप हो गया। मुझे वे दिन याद हो आए जब वह मेरे लिए मलाई बचाकर रखता था।
मुखातिब – सामने मुख करके बोलना
उन्होंने क्षमा माँगी कि वे लेखक को आम खिलाना भूल गए ।लेखक ने औपचारिकता निभाई और कहा कि उस साल उनहोंने बहुत आम खाए थे।
लेखक चुप रहे और उन्हें वो दिन याद हो आए जब काका उनके लिए मलाई बचाकर रखते थे ।
गाय तो अच्छी है न काका? मैंने पूछा।
गाय कहाँ है, लला! दो साल हुए बेच दी। कहाँ से खिलाता?
इतने में रज्जो, उसकी बेटी, अंदर से एक डलिया में ढेर से आम ले आई। यह तो बहुत हैं काका!
इतने कहाँ खा पाउँगा? मैंने कहा।
वाह-वाह! वह हँस पड़ा, शहरी ठहरे न!
ढेर – बहुत
लेखक गाय के बारें में जानना चाहता था । बदलू ने कहा कि उसने उसे दो साल पहले ही बेच दिया था । बदलू मां ने गाय बेच दी क्यूंकि वे उसे पाल नहीं सकते थे।  
इतने में उसकी बेटी रज्जों अन्दर से एक डलिया में बहुत से आम ले आई। लेखक ने कहा की वे इतने सारे आम नहीं खा पाएंगे। यह सुन बदलू काका हँस पड़े और की वे कहा शहरी ठहरे न! बदलू काका ने लेखक को ऐहसास दिलाया कि बचपन में आम देखते ही वे उन पर टूट पड़ते थे।
मैं तुम्हारी उमर का था तो इसके चौगुने आम एक बखत में खा जाता था। आप लोगों की बात और है। मैंने उत्तर दिया।
अच्छा, बेटी, लला को चार-पाँच आम छाँटकर दो। सिंदूरी वाले देना। देखो लला कैसे हैं? इसी साल यह पेड़ तैयार हुआ है।
चौगुने – चार-गुना
बखत – समय
बदलू काका ने अपनी बात कही कि जब वे लेखक की उम्र के थे,  तब वे चार-गुना ज्यादा आम खा जाया करते थे । लेखक ने कहा कि उनकी  बात और है, वे गाँव विहार के रहने वाले थे ।
बदलू काका ने अपनी बेटी से कहा की वह छाँट कर चार पांच बढ़िया सिंधूरी आम लेखक को दे । सिंदूरी आम एक किस्म की होती है जोकि बहुत अच्छी और मीठी होती है। बदलू ने कहा कि आम उसी मौसम में तैयार हुए थे और बहुत बढ़िया थे।  
रज्जो ने चार-पाँच आम अंजुली में लेकर मेरी ओर बढ़ा दिए। आम लेने के लिए मैंने हाथ बढ़ाया तो मेरी निगाह एक क्षण के लिए उसके हाथों पर ठिठक गई। गोरी – गोरी कलाइयों पर लाख की चूड़ियाँ बहुत ही फब रही थीं।
अंजुली – हथेली
ठिठक – रूक
फब – सुन्दर
रज्जो ने चार-पाँच आम अपनी हथेली में लेकर लेखक की ओर बढ़ा दिए।लेखक ने हाथ बढ़ाया तो उसकी निगाहें एक पल के लिए उसके हाथों पर रूक सी गई। उसके हाथों की कलाइयों पर लाख की चूड़ियाँ बहुत सुन्दर लग रही थी। अभी भी बदलू काका की बेटी ने वहीं लाख की चूड़ियाँ पहने हुए थी जो उसके पिता के द्वारा बनाई गई थी। उसके हाथों में बहुत सज़ रही थी।
बदलू ने मेरी दृष्टि देख ली और बोल पड़ा, यही आखिरी जोड़ा बनाया था जमींदार साहब की बेटी के विवाह पर। दस आने पैसे मुझको दे रहे थे। मैंने जोड़ा नहीं दिया। कहा, शहर से ले आओ। मैंने आम ले लिए और खाकर थोड़ी देर पश्चात चला आया। मुझे प्रसन्नता हुई कि बदलू ने हारकर भी हार नहीं मानी थी। उसका व्यक्तित्व काँच की चूड़ियों जैसा न था कि आसानी से टूट जाए।
दृष्टि – नज़र
बदलू ने लेखक की नज़र देख ली । वो लेखक के मन की बात को समझ या भाप गए थे । बदलू काका ने यह देखकर जवाब दिया कि यह आखिरी जोड़ा है। गाँव के जमींदार साहब की बेटी के विवाह पर बनाया था। उसके बदले में वे उसे  दस आने दे रहे थे । उसने लाख की चूड़ियों का जोड़ा देने से इन्कार कर दिया, कहा कि आप शहर से ले आओ। क्योंकि यह कीमत बहुत कम थी।
जैसा कि मशीनी युग की वजह से काम धन्धा बन्द हो गया था लेकिन वह हारे नहीं थे। वह पीछे नहीं हटे थे । उसका व्यवहार काँच की चूड़ियों जैसा न था अर्थात् काँच की चूड़ियों की तरह नजुक नहीं था कि आसानी से टूट जाए। वह बहुत ही कठोर परिश्रमी स्वभाव के थे और अपने काम में विश्वास रखते थे।

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Lakh Ki Chudiyan Question Answers – प्रश्न अभ्यास

प्र॰1 बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से क्यों जाता था और बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ क्यों कहता था?
उत्तर- बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से इसलिय जाता था क्योंकि वहाँ बदलू उसे लाख की गोलियाँ बनाकर देता था। जो उसे पसंद थी। लेखक उसे “बदलू मामा” न कहकर “बदलू काका” इसलिए कहता था क्योंकि गाँव के सभी बच्चें उसे “बदलू काका”कहते थे।
प्र॰2 वस्तु-विनिमय क्या है? विनिमय की प्रचलित पद्धति क्या है?
उत्तर – वस्तु विनियम एक पुरानी व्यापार पध्दति है। जिसमें वस्तु के बदले वस्तु दी जाती है। पुराने समय में के वस्तु बदले पैसे का लेनदेन नहीं होता था। आधुनिक व्यापार पध्दति में वस्तु के बदले धन का लेनदेन होता है।
प्र॰3 ‘मशीनी युग ने कितने हाथ काट दिए हैं।’-इस पंक्ति में लेखक ने किस व्यथा की ओर संकेत किया है?
उत्तर – मशीनीकरण के कारण हस्तशिल्प पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। मशीनों के आ जाने से कई लोगों की आमदनी साधन न रहा। लोग बेरोज़गार हो गए हैं। बढ़ गई है। पैतृक व्यवसाय बंद हो गया है। ऊपर लिखी गई पंक्ति बदलू की दशा की ओर संकेत करती है। लाख की चूड़ियों का व्यवसाय बंद हो गया। इसका उसके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा है। उसकी आर्थिक स्थिति और स्वास्थ बिगड़ गया।
प्र॰4 बदलू के मन में ऐसी कौन-सी व्यथा थी जो लेखक से छिपी न रह सकी।
उत्तर – मशीनीकरण के आने तथा काँच की चूड़ियों के प्रचलन एवं गाँव में औरतों के काँच की चूड़ियों के पहनने के कारण बदलू का व्यवसाय बिल्कुल बंद हो गया था। उसकी आर्थिक स्थिति भी ख़राब हो गई थी। अपना पैतृक काम खो देने की व्यथा लेखक से छिपी नसकी।
प्र॰5 मशीनी युग से बदलू के जीवन में क्या बदलाव आया?
उत्तर – मशीनी युग के कारण बदलू का सुखी जीवन दुख में बदल गया था। गाँव की सारी औरतें काँच की चूड़ियाँ पहनने लगी थी। बदलू की कला को अब कोई नहीं पूछता था। उसकी चूड़ियों की माँग अब नहीं रही थी। इसी कारण शादी-ब्याह से मिलने वाला अनाज, कपड़े तथा अन्य उपहार उसे नहीं मिलते थे। उसकी आर्थिक हालत बिगड़ गई जिससे उसके स्वास्थ पर भी बुरा असर पड़ा था।

Khule Akash me by Conquer Classes

Khule Akash me Hindi ICSE 8























गर्मियों के दिनों में मेरे घर के पीछे अक्सर हलचल मची रहती है। यह ठीक है कि मेरी पत्नी पक्षियों के लिए ढेर सारे दाने और रोटी के टुकड़े घर के पीछे फेंक देती है। पर यह हलचल का कारण नहीं है।1
कई पक्षी स्वयं चुग्गा चुगते हैं और दूसरे पक्षियों को भी आवाजें लगाते हैं? पर कई सिर्फ अपने आप चुग्गा चुगते हैं और दूसरों को पास भी नहीं फटकने देते। पर हलचल का कारण यह भी नहीं है।1
वास्तव में बात यह है कि जब मासूम चिड़िया दीवार या स्नानघर के कोनों में अपने घोंसले बना लेती हैं तब शारकें तुरन्त हाज़िर हो जाती हैं। चिड़िया जो भी तिनका-तिनका इकठ्ठा करती हैं? शारके उनको एक-एक कर बिखेर देती हैं। पर चिड़ियाँ मोर्चे पर डटी रहती हैं। . . .
1
प्रत्येक वर्ष ऐसा ही होता है। कुछ दिन पहले एक बार जब मेरी पत्नी दोपहर के बाद घर के पीछे गई तो उसने देखा कि घोंसले के नीचे धरती पर एक अण्डा टूटा पड़ा था।
1
"यह शारके की शरारत है।" उसने गुस्से से कहा . "मैं शारकों को इस घर में नहीं आने दूँगी।"


"तू कैसे रोकेगी?
"मैं रोक लूँगी।"
"पक्षियों पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई जा सकती।"
"फिर उन्होंने चिड़िया का अण्डा क्यों तोड़ा?
"चल? हमें क्या।"
"क्यों? है क्यों नहीं? उसने गुस्से से कहा, "चिड़िया ने हमारे घर में घोंसला बनाकर अण्डे दिए हैं... हमारा फर्ज है उसकी रखवाली करना।"
उस दिन बात वहीं समाप्त हो गई। क्योंकि वह बहुत भावुक नज़र आ रही थी और स्त्री जब भावुक हो तो उसके साथ मुकाबला नहीं हो सकता।

कालिज में छुट्टियाँ थीं और मैं सप्तसिंधु के लोगों के बारे में अपना शोधपत्र पूरा कर रहा था। वैदिक काल के आर्य लोगों से लेकर आज तक सप्तसिंधु अथवा पंजाब के लोगों को विदेशी हमलावारों और प्रकृति की निर्दयी शक्तियों से युद्ध करना पड़ा है? तब जाकर वे अपने आपको इस धरती पर स्थापित कर सके हैं। ... अब तो इस धरती पर वातावरण में ऐसे शौर्यपूर्ण भाव व्याप्त हैं जो हर किसी को जुल्म के विरुद्ध उठने के लिए प्रेरित करते हैं। मैं दोपहर तक लिखता हूँ और फिर खाना खाकर सो जाता हूँ। सोते हुए भी मैं प्रायः बहादुर पंजाबी लोगों के कारनामों के बारे में सोचता रहता हूँ।

एक दिन दोपहर के वक्त मेरी आँख लगी ही थी कि मैंने घर के पिछवाड़े पक्षियों की चीख-पुकार और बहुत ज़ोर का शोर सुना। मैं तुरन्त उठकर बैठ गया। मेरी पत्नी कह रही थी . "इन शारकों ने चिड़िया के बच्चे को नहीं छोड़ना।"
"क्या कर लेंगी?
"मार देंगी।"
"क्यों? क्या पक्षियों में भी ईर्ष्या होती है?
"आपका क्या ख्याल है? आदमियों में ही होती है?
पल भर रुक कर उसने फिर कहा . "परसों चिड़िया का बच्चा नीचे गिर गया था।"
"
फिर?
"मैंने उसको उठाकर? घोंसले में रख दिया।"
"वह तुमसे डरा नहीं?
"नहीं ... पक्षियों को भी अपने चाहने वालों का पता होता है।"
अभी हम बात कर ही रहे थे कि चिड़ियों की चीं-चीं का बहुत बड़ा तूफान उठा और मेरी पत्नी तुरन्त उठकर आगे आई? पर मैंने उसकी बाजू पकड़ कर रोक लिया।
"क्या बात है?
"चिड़ियों को अपनी सहायता स्वयं करने दो," मैंने कहा। वह जल्दी से बोली, "वह कमज़ोर हैं।"
"नहीं ... तुम ही उनको कमज़ोर समझती हो।"
"तो क्या ... ?
"तुम उनको शारकों के विरुद्ध लड़ने दो। हमें हर समय उनके साथ नहीं रहना।"
मैंने कहा . "ज़्यादा से ज़्यादा वह बच्चा खत्म ही तो हो जायेगा ... "
"हाँ ... हाँ ... ।"
"पर चिड़िया डटके लड़ना सीख जायेंगी।"
उसने धैर्य से कहा . "मैं देख तो लूँ क्या हो रहा है।"
"अवश्य देखो ... पर उनकी लड़ाई में दखल मत देना।"
"इस तरह बुराई को सहारा मिलता है," उसने प्रतिवाद किया।
मैंने कहा . "जिसके साथ बुराई होती है वह भी तो बुराई के विरुद्ध डटे।"
"अच्छा फिर ... लड़ने दो।" मेरी पत्नी ने बात खत्म कर दी।

घर के पीछे दूसरे समय का सूरज गरम हो रहा था। हमारे घर का मुँह पूरब की ओर है जिस कारण हम गर्मियों में सुबह घर के पीछे पश्चिम की ओर बैठते हैं और दोपहर बाद जब सूर्य पश्चिम की ओर झुक जाता है तब पूर्व की ओर घर के सामने बैठ जाते हैं।

हमने पीछे बरामदे में जाकर जाली के दरवाजे से देखा तो दोपहर को पाँच शारकों ने चिड़ियों के घोंसले को घेरा हुआ था। चिड़िया और चिड़ा दोनों ही घोंसले के आगे बैठे शारकों का मुकाबला कर रहे थे। किसी समय दो शारकें घोंसले पर हमला करतीं और कभी तीन। चिड़िया का बच्चा घोंसले के पीछे बैठा जोर-जोर से चीं-चीं कर रहा था। पता नहीं क्या कह रहा था।

कल एक चक्कीहारा भी घोंसले को मुँह मार रहा था। मेरी पत्नी ने घबराहट में कहा, "पर मैंने उसको भगा दिया... ये शारकें तो पीछे ही पड़ गई है।"
"कोई बात नहीं... तुम इनका मुकाबला देखो।"

चिड़ियों के घोसले पर हमला करने वाली शारकें बहुत लड़ाकी और फुर्तीली थीं। उनके साँवले रंग और पीली चोंचें नुकीली थीं। वे जब बोलतीं तो बड़ी संगीतमयी आवाज़ निकलती? पर वे काम क्या कर रही थीं? मैंने अपनी पत्नी से कहा "शारकों का साँवला रंग इनकी ईर्ष्या के कारण ही हुआ होगा।"
"क्या कहा जा सकता है?
"यही बात प्रतीत होती है।"
"आपने कहीं पढ़ा है क्या?
"नहीं? यह अनुभव की बात है और अनुभव की गवाही कभी गलत नहीं होती।"
पल भर वह रुक कर बोली, "मैं शारकों को उड़ाने लगी हूँ।"
"प्रतिदिन उड़ाओगी?
"
फिर क्या करुँ? मुझसे बर्दाश्त नहीं होता ...।"
"फिर तुम चिड़ियों को घर में घोंसले मत बनाने दो।"
"मेरे से यह नहीं हो सकेगा।"
"फिर इसे बर्दाश्त करो।"
"किसे?
"जो कुछ हो रहा है।"
"पर यह तो ज्यादती है।"
मैंने जवाब नहीं दिया।

वैसे मैं सोच रहा था ...'शारकें सोच रही होंगी ? यदि धरती और आकाश में चिड़िया ही चिड़िया हो गई तो हमारा क्या बनेगा ? इसलिए ठीक यही है कि चिड़ियों की नसल को बढ़ने ही न दिया जाए।'

उस समय जितने गुस्से से शारकों ने चिड़ियों पर हमला किया और चिड़ियों ने उस हमले को रोका? उस तरह अकसर आदमी भी नहीं कर सकते।

दोपहर का समय था और पक्षी एक दूसरे का मुकाबला करके थक गये थे। ऐसा लग रहा था कि शारकें निराश हो गई थीं। उनकी उड़ान में पहले जैसा उत्साह नहीं था। चिड़िया और चिड़ा भी डटे हुए थे। चाहे वे थक गये थे और उनकी साँस तेज़ी से चल रही प्रतीत हो रही थी पर उनको लग रहा था कि अगर आज वे अपने बच्चे को न बचा सके तो शर्म से मर 
जायेंगे।

"बात क्या है? एक बिल्ली भी घोंसले की ओर झाँक रही थी।" मेरी पत्नी बोली "पर वह ऊपर नहीं पहुँच सकती थी।"
"चिड़ियों के दुश्मन बहुत हैं।" मैंने कहा . "पर फिर भी यह हर जगह होती हैं ... खुले आकाश में विचरती हैं ... .और कभी किसी का भय नहीं मानतीं ... ।"
मेरी यह बात सुनकर मेरी पत्नी की आँखों में चमक आ गई . "आपकी यह बात तो ठीक है।"

उस समय हमने देखा चिड़िया चीं-चीं करके शारकों को ललकार रही थी ...कि हिम्मत है तो करो मुकाबला? मैंने कहा . "हमलावर में तब तक हिम्मत होती है जब तक कोई उसका मुकाबला नहीं करता? क्योंकि जुल्म करने वाले के पास प्राकृतिक शक्ति नहीं होती।"

सूरज पश्चिम की ओर अस्त हो रहा था। लोग बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। अब तक बच्चे भी उठ गये थे परन्तु उनको बिल्कुल मालूम न था कि चिड़ियों ने शारकों का कैसे मुकाबला किया। मेरी पत्नी संतुष्ट थी। वह सोच रही थी कि अगर जुल्म करने वाले का मुकाबला किया जाये तो जुल्म रुक सकता है।

अभी हमने चाय खत्म भी नहीं की थी कि पीछे से फिर पक्षियों का शोर उठा और मेरी पत्नी ने घबराकर कहा . "इस बार शारकें चिड़िया के बच्चे को नहीं छोड़ेंगी।"
"फिर घबरा गई।"
"बात ही घबराहट वाली है।"
"पर तुम चिन्ता न करो।"
यह बात सुनकर काका हमारा बेटा? जल्दी से आँगन की ओर बढ़ा और फिर तुरन्त वापिस आ गया और बोला . "मम्मी जी? भागकर आओ।"
"क्या हुआ?
"बहुत ही दिलचस्प नज़ारा है।ठ
हम सभी जल्दी से पिछवाड़े की ओर गये। दृश्य सचमुच ही दिलचस्प था।
चिड़िया का बच्चा घोंसले में से निकलकर आँगन में आ गया था और सारी चिड़ियाँ उसको अपने साथ उड़ना सिखा रही थीं। उसके पर पूरी तरह उड़ने के लिए तैयार थे और उसका शरीर भी ताकतवर था।

वहाँ एक भी शारके नहीं था।

"यह तो कुछ ही दिनों में इतना बड़ा हो गया? मेरी पत्नी ने खुश होकर कहा . "वाहूँ वाहूँ
"तुझे मालूम नहीं"? मैंने कहा. "मुकाबला आदमी को शक्तिशाली बना देता है।"

अगले पल ही एक जोरदार चीं-चीं की आवाज गूँजी और वह बच्चा पूरे जोर से दीवार के ऊपर से? बिजली के तारों को पार करता हुआ विस्तृत खुले आकाश में उड़ गया।

Hindi ICSE 8 Etne Uche Utho

कविता ’इतने ऊँचे उठो’ का सप्रसंग भावार्थ

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरासमता की भाव वृष्टि से
जाति भेद कीधर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
प्रसंग: प्रस्तुत पद्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ________ से ली गई हैं । इस कविता का शीर्षक ’इतने ऊँचे उठो’ है। इस कविता के कवि ’श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी’ है।
संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियों में, सभी भेदभावों से ऊपर उठकर समाज में समानता का भाव जगाने की बात कही गई है।
अर्थ: प्रस्तुत पद्य पंक्तियों में कवि कहते हैं कि हमें नए समाज निर्माण में अपनी नई सोच को जाति, धर्म, रंग-द्वेष  आदि जैसे भेदभावों से ऊपर उठकर सभी को समानता की दृष्टि से देखना चाहिये। जिस प्रकार वर्षा सभी के ऊपर समान रूप से होती है उसी प्रकार हमें भी सभी के साथ समान रूप से पेश आना चाहिए। हमें नफरत की आग को समाप्त कर समाज में मलय पर्वत से आने वाली हवा की तरह शीतलता और शांति लाने का प्रयत्न करना चाहिए।  

नये हाथ सेवर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
अर्थ: इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि नए समाज के निर्माण में हमें आगे बढ़कर अपनी कल्पनाओं को आकार देकर उन्हे वास्तविक जीवन में लाने का प्रयत्न करना चाहिए। जिसप्रकार कोई कलाकार अपनी कूँची से अपने चित्रों में रंग भरता है, और जिसप्रकार संगीतकार अपने नए राग में स्वरों को पिरोता है, उसी प्रकार हमें भी अपने समाज को नया रूप देने के लिए सृजनात्मक बनना होगा। और सृजन को हमें अपने अंदर मौलिक रूप से ग्रहण करना होगा।

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धनरुके  चिंतन
गतिजीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
अर्थ: कवि कहते हैं कि हमे अपने अतीत में हुई बुरी घटनाओं को छोड़कर केवल अच्छी बातों को ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि ये अच्छी यादे या घटनाएँ ही हमारे भविष्य निर्माण में हमारे काम आएँगी जबकि बुरी घटनाएँ हमें सदैव पीछे की ओर ही खींचेंगी, इनसे हमारा विकास अवरुद्ध होगा। कवि कहते हैं कि जिसतरह परिवर्तन सदैव होता रहता है उसी प्रकार हमें भी सभी बंधनों को तोड़कर हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए। क्योंकि आगे बढ़ना ही जीवन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्गउसे धरती पर लाना
सूरजचाँदचाँदनीतारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥

अर्थ: कवि कहते हैं कि यदि हम धरती को स्वर्ग की तरह सुंदर बनाना चाहते हैं तो हमें  अपनी कल्पनाओं को मूर्त रूप देते हुए (साकार करते हुए) अच्छाइयों को लेकर आगे बढ़ना चाहियो और हम अपने समाज को  सभीबुराइयों से ऊपर उठाकर एक खूबसूरत समाज की रचना कर सकते हैं कवि कहते हैं कि हमें अपनी सोच और भावनाएँ सदैव अच्छी रखनी चाहिए जिससे एक सुंदर समाज की रचना होगी और वह समाज सदैव विकास की ओर बढ़ता रहेगा। जिसप्रकार हम किसी आकर्षण की ओर खिंचे चले जाते है उसी प्रकार अच्छी सोच के साथ हमें खुद को भी आकर्षक बनाना है

Thursday, April 30, 2020

Covid-19 prevention



I'm writing this article when Covid 19 in India reached 34863 where in Maharashtra total cases reached 10498, Gujarat 4395, Delhi 3515 are top 3 Covid-19 suffering states. Why after lock-down Covid-19 cases are increasing day by day in Metro city with a double pace. The reason is clear that people are living like a jam packed in Metro cities and mostly population in these cities are underestimating the Covid-19. If we want to stop Covid-19 100% then we need to follow below instruction very strictly :-
  • Clean your hands often. Use soap and water, or an alcohol-based hand rub.
  • Maintain a safe distance from anyone who is coughing or sneezing.
  • Don’t touch your eyes, nose or mouth.
  • Cover your nose and mouth with your bent elbow or a tissue when you cough or sneeze.
  • Stay home if you feel unwell.
  • If you have a fever, a cough, and difficulty breathing, seek medical attention. Call in advance.
  • Follow the directions of your local health authority.
Most important quarantine in your home until and unless urgent work is their. 

Cancer in non smoker


How Non Smoker Occure Lung Cancer :-


Lung cancer is the leading cause of cancer deaths worldwide.



People who smoke have the greatest risk of lung cancer, though lung cancer can also occur in people who have never smoked. 


Many people are dying by Cancer every day. Actor Irfan Khan died on 29 April 2020 and Rishi Kapoor died on 30 April 2020, both were suffering from Cancer.
Cancer is the uncontrolled growth of abnormal cells anywhere in a body. There are over 200 types of cancer. More than 1 million cases per year (India). India. According to the National Cancer Registry Programme of the India Council of Medical Research (ICMR), more than 1300 Indians die every day due to cancer.

We can save us from Cancer by
1.    DON'T USE TOBACCO
2.    PROTECT YOUR SKIN FROM THE SUN
3.    EAT A HEALTHY DIET
4.    MAINTAIN A HEALTHY WEIGHT AND BE PHYSICALLY ACTIVE
5.    PRACTICE SAFE SEX AND AVOID RISKY BEHAVIORS
6.    GET IMMUNIZED (HPV & HEPATITIS VACCINES)

Everywhere we see that tobacco cause Cancer but still people used to Smoke,Drink,Tobacco.

Now you say that Why non smoker occur Cancer?

 About 10 percent of men and 20 percent of women who develop lung cancer have never smoked

While tobacco is by far the leading cause of lung cancer. The leading cause of lung cancer in non-smokers is exposure to radon gas, according to the US Environmental Protection Agency (EPA).

Radon is a naturally occurring radioactive gas which may be found in indoor environments such as homes, schools, and workplaces. 

Radon is the most important cause of lung cancer after smoking. The main source of indoor radon is radon gas infiltration from soil into buildings. Rock and soil produce radon gas. Building materials, the water supply, and natural gas can all be sources of radon in the home. Basements allow more opportunity for soil gas entry than slab-on-grade foundations. It's common: About 1 in every 15 homes has what's considered an elevated radon level. The gas is odorless and invisible, says the EPA, and it causes no immediate symptoms, so the only way to know if your home is affected is by testing your individual residence. Every building contains radon but the levels are usually low. In some parts of the country homes may have higher levels, and the chances of a higher level depend on the type of ground.

There's no single method that fits all radon removal system needs. Common techniques include: Sub-slab depressurization, where suction pipes are inserted through the floor or concrete slab into the concrete slab below the home. A radon vent fan then draws out the radon gas and releases it into the air outside.


Lung cancer can cause complications, such as:
·         Shortness of breath. People with lung cancer can experience shortness of breath if cancer grows to block the major airways. Lung cancer can also cause fluid to accumulate around the lungs, making it harder for the affected lung to expand fully when you inhale.
·         Coughing up blood. Lung cancer can cause bleeding in the airway, which can cause you to cough up blood (hemoptysis). Sometimes bleeding can become severe. Treatments are available to control bleeding.
·         Pain. Advanced lung cancer that spreads to the lining of a lung or to another area of the body, such as a bone, can cause pain. Tell your doctor if you experience pain, as many treatments are available to control pain.
·         Fluid in the chest (pleural effusion). Lung cancer can cause fluid to accumulate in the space that surrounds the affected lung in the chest cavity (pleural space).
Fluid accumulating in the chest can cause shortness of breath. Treatments are available to drain the fluid from your chest and reduce the risk that pleural effusion will occur again.
·         Cancer that spreads to other parts of the body (metastasis). Lung cancer often spreads (metastasizes) to other parts of the body, such as the brain and the bones.
Cancer that spreads can cause pain, nausea, headaches, or other signs and symptoms depending on what organ is affected. Once lung cancer has spread beyond the lungs, it's generally not curable. Treatments are available to decrease signs and symptoms and to help you live longer.

 

Prevention

There's no sure way to prevent lung cancer, but you can reduce your risk if you:

·         Don't smoke. If you've never smoked, don't start. Talk to your children about not smoking so that they can understand how to avoid this major risk factor for lung cancer. Begin conversations about the dangers of smoking with your children early so that they know how to react to peer pressure.
·         Stop smoking. Stop smoking now. Quitting reduces your risk of lung cancer, even if you've smoked for years. Talk to your doctor about strategies and stop-smoking aids that can help you quit. Options include nicotine replacement products, medications and support groups.
·         Avoid secondhand smoke. If you live or work with a smoker, urge him or her to quit. At the very least, ask him or her to smoke outside. Avoid areas where people smoke, such as bars and restaurants, and seek out smoke-free options.
·         Test your home for radon. Have the radon levels in your home checked, especially if you live in an area where radon is known to be a problem. High radon levels can be remedied to make your home safer. For information on radon testing, contact your local department of public health or a local chapter of the Lung Association.
·         Avoid carcinogens at work. Take precautions to protect yourself from exposure to toxic chemicals at work. Follow your employer's precautions. For instance, if you're given a face mask for protection, always wear it. Ask your doctor what more you can do to protect yourself at work. Your risk of lung damage from workplace carcinogens increases if you smoke.
·         Eat a diet full of fruits and vegetables. Choose a healthy diet with a variety of fruits and vegetables. Food sources of vitamins and nutrients are best. Avoid taking large doses of vitamins in pill form, as they may be harmful. For instance, researchers hoping to reduce the risk of lung cancer in heavy smokers gave them beta carotene supplements. Results showed the supplements actually increased the risk of cancer in smokers.
·         Exercise most days of the week. If you don't exercise regularly, start out slowly. Try to exercise most days of the week.




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